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शेर
फ़ज़्ल लखनवी
शेर
तुम्हें परवा न हो मुझ को तो जिंस-ए-दिल की परवा है
कहाँ ढूँडूँ कहाँ फेंकी कहाँ देखूँ कहाँ रख दी
साइल देहलवी
शेर
सुहैल अज़ीमाबादी
शेर
उल्फ़त-ए-सय्याद से मजबूर हूँ ऐ हम-नफ़स
वर्ना अब भी बाज़ुओं में क़ुव्वत-ए-पर्वाज़ है
सब्र कलकत्तवी
शेर
ये दिन और रात किस जानिब उड़े जाते हैं सदियों से
कहीं रुकते तो मैं भी शामिल-ए-पर्वाज़ हो सकता
शाहीन अब्बास
शेर
क़िस्सा-ए-मजनूँ-ओ-फ़र्हाद भी इक पर्दा है
जो फ़साना है यहाँ शरह-ओ-बयाँ है अपना