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शेर
मुसलमाँ था मगर तेरी अदा-ए-फ़ित्ना-परवर ने
दिखा कर काकुल-ए-पेचाँ मुझे काफ़िर बना डाला
मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र
शेर
अपने मरकज़ की तरफ़ माइल-ए-परवाज़ था हुस्न
भूलता ही नहीं आलम तिरी अंगड़ाई का
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
हम ने हँस हँस के तिरी बज़्म में ऐ पैकर-ए-नाज़
कितनी आहों को छुपाया है तुझे क्या मालूम