aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "parveen-shakir"
बारहा तेरा इंतिज़ार कियाअपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह
राय पहले से बना ली तू नेदिल में अब हम तिरे घर क्या करते
इतने घने बादल के पीछेकितना तन्हा होगा चाँद
शब वही लेकिन सितारा और हैअब सफ़र का इस्तिआरा और है
गुलाबी पाँव मिरे चम्पई बनाने कोकिसी ने सहन में मेहंदी की बाड़ उगाई हो
घर आप ही जगमगा उठेगादहलीज़ पे इक क़दम बहुत है
अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँइक ज़रा शेर कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ
मसअला जब भी चराग़ों का उठाफ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है
हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँदो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं
क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वालाज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला
धीमे सुरों में कोई मधुर गीत छेड़िएठहरी हुई हवाओं में जादू बिखेरिए
अब्र बरसे तो इनायत उस कीशाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है
रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना थाज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया
रात के शायद एक बजे हैंसोता होगा मेरा चाँद
मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईंशेर कहती हुई आँखें उस की
गवाही कैसे टूटती मुआमला ख़ुदा का थामिरा और उस का राब्ता तो हाथ और दुआ का था
शब की तन्हाई में अब तो अक्सरगुफ़्तुगू तुझ से रहा करती है
रुख़्सत करने के आदाब निभाने ही थेबंद आँखों से उस को जाता देख लिया है
शाम पड़ते ही किसी शख़्स की यादकूचा-ए-जाँ में सदा करती है
ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तोतेरे कहने में रहा करती है
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