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शेर
अपने मरकज़ की तरफ़ माइल-ए-परवाज़ था हुस्न
भूलता ही नहीं आलम तिरी अंगड़ाई का
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
ये दिन और रात किस जानिब उड़े जाते हैं सदियों से
कहीं रुकते तो मैं भी शामिल-ए-पर्वाज़ हो सकता
शाहीन अब्बास
शेर
फ़ज़ा का तंग होना फ़ितरत-ए-आज़ाद से पूछो
पर-ए-पर्वाज़ ही क्या जो क़फ़स को आशियाँ समझे
फ़िगार उन्नावी
शेर
कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा
कुछ फ़ज़ा कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
पहले डाली तिरे चेहरे पे बहुत देर नज़र
'ईद का चाँद तो फिर बा'द में देखा मैं ने