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शेर
है दौर-ए-फ़लक ज़ोफ़ में पेश-ए-नज़र अपने
किस वक़्त हम उठते हैं कि चक्कर नहीं आता
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
शेर
रुख़-ए-‘आलम को पेश-ओ-पस न कर दें ये जुनूँ-पेशा
ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े वक़्फ़े से पुकारा है
तौहीद ज़ेब
शेर
रुख़-ए-'आलम को पेश-ओ-पस न कर दें ये जुनूँ-पेशा
ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े-वक़्फ़े से पुकारा है
तौहीद ज़ेब
शेर
बस कि है पेश-ए-नज़र पस्त-ओ-बुलंद-ए-आलम
ठोकरें खा के मिरी आँखों में ख़्वाब आता है