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शेर
मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब
'उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किया
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
तू ने मुँह फेरा और उस का नूर सा जाता रहा
था तिरी सूरत ही तक ऐ यार आईने का लुत्फ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही
उस ने जो फेर ली नज़र मैं ने भी जाम रख दिया