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शेर
ज़रा ऐ जोश-ए-ग़म रहने दे क़ाबू में ज़बाँ मेरी
वो सुनना चाहते हैं ख़ुद मुझी से दास्ताँ मेरी
अब्दुल हई आरफ़ी
शेर
कमाल-ए-जोश-ए-जुनूँ में रहा मैं गर्म-ए-तवाफ़
ख़ुदा का शुक्र सलामत रहा हरम का ग़िलाफ़
अल्लामा इक़बाल
शेर
करते हैं अर्बाब-ए-दिल अंदाज़ा-ए-जोश-ए-बहार
मेरा दामन देख कर मेरा गरेबाँ देख कर
अब्बास अली ख़ान बेखुद
शेर
इक न इक ज़ुल्मत से जब वाबस्ता रहना है तो 'जोश'
ज़िंदगी पर साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ क्यूँ न हो
जोश मलीहाबादी
शेर
इन दिनों शहर से जी सख़्त ब-तंग आया है
ले चल ऐ जोश-ए-जुनूँ सू-ए-बयाबाँ मुझ को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
अगर तेरी तरह तब्लीग़ करता पीर-ए-मय-ख़ाना
तो दुनिया-भर में वाइज़ मय-कशी ही मय-कशी होती