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शेर
वहशियों को क़ैद से छूटे हुए मुद्दत हुई
गूँजता है शोर अब तक कान में ज़ंजीर का
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
शेर
गुफ़्तुगू की तुम से आदत हो गई है वर्ना में
जानता हूँ बात करती है कहीं तस्वीर भी
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
शेर
तुम ऐसे बे-ख़बर भी शाज़ होंगे इस ज़माने में
कि दिल में रह के अंदाज़ा नहीं है दिल की हालत का
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
शेर
देखना है किस में अच्छी शक्ल आती है नज़र
उस ने रक्खा है मिरे दल के बराबर आईना