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शेर
क़दम रक्खा जो राह-ए-इश्क़ में हम ने तो ये देखा
जहाँ में जितने रहज़न हैं इसी मंज़िल में रहते हैं
जलील मानिकपूरी
शेर
वस्ल-ओ-हिज्राँ दो जो मंज़िल हैं ये राह-ए-इश्क़ में
दिल ग़रीब उन में ख़ुदा जाने कहाँ मारा गया
मीर तक़ी मीर
शेर
जाती नहीं है सई रह-ए-आशिक़ी में पेश
जो थक के रह गया वही साबित-क़दम हुआ
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
शेर
उसी को हम समझ लेते हैं अपना सादगी देखो
जो अपने साथ राह-ए-शौक़ में दो गाम आता है
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
शेर
अब राह-ए-वफ़ा के पत्थर को हम फूल नहीं समझेंगे कभी
पहले ही क़दम पर ठेस लगी दिल टूट गया अच्छा ही हुआ
मंज़र सलीम
शेर
तअस्सुब बर-तरफ़ मस्जिद हो या हो कू-ए-बुत-ख़ाना
रह-ए-दिलदार पर जाता क़दम यूँ भी है और यूँ भी