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शेर
जादा-ए-राह-ए-मोहब्बत की दराज़ी मत पूछ
मंज़िल-ए-शौक़ का हर ज़र्रा बयाबाँ निकला
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
शेर
रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
शेर
रह-ओ-रस्म-ए-मोहब्बत इन हसीनों से मैं क्या रक्खूँ
जहाँ तक देखता हूँ नफ़अ उन का है ज़रर अपना
अकबर इलाहाबादी
शेर
आले रज़ा रज़ा
शेर
न छेड़ ऐ शैख़ हम यूँही भले चल राह लग अपनी
तुझे तो बीवियाँ सूझी हैं हम बेज़ार बैठे हैं
ए. डी. अज़हर
शेर
किसी के संग-ए-दर से एक मुद्दत सर नहीं उट्ठा
मोहब्बत में अदा की हैं नमाज़ें बे-वुज़ू बरसों