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शेर
तिश्ना-लबी रहीन-ए-मय-ए-तल्ख़ है तो क्या
शीरीनी-ए-हयात की लज़्ज़त कहाँ से लाएँ
ताबिश हमदून उस्मानी
शेर
धूम कर रक्खी थी कल रिंदों ने बज़्म-ए-वा'ज़ में
पगड़ी ग़ाएब थी जनाब-ए-शैख़ की गुल था चराग़
नातिक़ गुलावठी
शेर
नियाज़-ए-इश्क़ को समझा है क्या ऐ वाइज़-ए-नादाँ
हज़ारों बन गए काबे जबीं मैं ने जहाँ रख दी