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शेर
ये रूह रक़्स-ए-चराग़ाँ है अपने हल्क़े में
ये जिस्म साया है और साया ढल रहा है मियाँ
नसीर तुराबी
शेर
मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ
वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ
कलीम आजिज़
शेर
अहरमन का रक़्स-ए-वहशत हर गली हर मोड़ पर
बरबरिय्यत देख कर है ख़ुद क़ज़ा सहमी हुई
सय्यद शकील दस्नवी
शेर
दिल सदा तड़पे है मेरा मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह
या कि सीखी मुर्ग़-ए-बिस्मिल ने मिरे दिल की तरह
राय सरब सुख दिवाना
शेर
ज़हर पी कर भी यहाँ किस को मिली ग़म से नजात
ख़त्म होता है कहीं सिलसिला-ए-रक़्स-ए-हयात