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शेर
जो पा लिया तुझे मैं ख़ुद को ढूँडने निकला
तुम्हारे क़ुर्ब ने भी ज़ख़्म-ए-ना-रसाई दिया
हज़ीं लुधियानवी
शेर
वाँ रसाई ही नहीं मजनून-ए-सहरा-गर्द की
आलम-ए-इम्काँ से भी बाहर मिरा वीराना है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
तो भी उस तक है रसाई मुझे एहसाँ दुश्वार
दाम लूँ गर पर-ए-जिब्रील बरा-ए-पर्वाज़