aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "rush"
पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरहज़ुल्फ़ों को रुख़ पे डाल के झटका दिया कि यूँ
मुझ को आदत है रूठ जाने कीआप मुझ को मना लिया कीजे
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैंरुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
कभी यक-ब-यक तवज्जोह कभी दफ़अतन तग़ाफ़ुलमुझे आज़मा रहा है कोई रुख़ बदल बदल कर
ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिएरूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है
उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों मेंनज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में
ज़िंदगी भर के लिए रूठ के जाने वालेमैं अभी तक तिरी तस्वीर लिए बैठा हूँ
ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेराऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा
जाने जो करे क़ौल न पूरा करे हर काम अधूरा यही दिन-रात तसव्वुर है कि नाहक़उसे चाहा जो न आए न बुलाए न कभी पास बिठाए न रुख़-ए-साफ़ दिखाए न कोई
न जाने रूठ के बैठा है दिल का चैन कहाँमिले तो उस को हमारा कोई सलाम कहे
उन्हें अपने दिल की ख़बरें मिरे दिल से मिल रही हैंमैं जो उन से रूठ जाऊँ तो पयाम तक न पहुँचे
ज़रा रूठ जाने पे इतनी ख़ुशामद'क़मर' तुम बिगाड़ोगे आदत किसी की
मिरी रूह की हक़ीक़त मिरे आँसुओं से पूछोमिरा मज्लिसी तबस्सुम मिरा तर्जुमाँ नहीं है
रुख़-ए-रौशन के आगे शम्अ रख कर वो ये कहते हैंउधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है
जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुईबदन पुराना हुआ रूह भी पुरानी हुई
दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिलजिस शख़्स ने हालात का रुख़ मोड़ दिया हो
धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह काचंदा वसूल होता है साहब दबाव से
जनाब के रुख़-ए-रौशन की दीद हो जातीतो हम सियाह-नसीबों की ईद हो जाती
सदा एक ही रुख़ नहीं नाव चलतीचलो तुम उधर को हवा हो जिधर की
हज़ार रुख़ तिरे मिलने के हैं न मिलने मेंकिसे फ़िराक़ कहूँ और किसे विसाल कहूँ
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