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शेर
हम अपने घर में भी अब बे-सर-ओ-सामाँ से रहते हैं
हमारे सिलसिले ख़ाना-ख़राबों से निकल आए
ख़ुशबीर सिंह शाद
शेर
सिवा तेरे हर इक शय को हटा देना है मंज़र से
और इस के ब'अद ख़ुद को बे-सर-ओ-सामान करना है
हसन अब्बास रज़ा
शेर
वुसअ'त-ए-मशरब-ए-रिंदाँ का नहीं है महरम
ज़ाहिद-ए-सादा हमें बे-सर-ओ-सामाँ समझा
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
शेर
क्या ख़बर थी इस क़दर पुर-कैफ़ नग़्मे हैं निहाँ
ज़िंदगी को एक साज़-ए-बे-सदा समझा था मैं
मुसतफ़ा राही
शेर
मिरी ज़िंदगी का महवर यही सोज़-ओ-साज़-ए-हस्ती
कभी जज़्ब-ए-वालहाना कभी ज़ब्त-ए-आरिफ़ाना