aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "samaa.e.n"
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजेइक आग का दरिया है और डूब के जाना है
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहींसामान सौ बरस का है पल की ख़बर नहीं
जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरायाद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही हैतू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
अपने सामान को बाँधे हुए इस सोच में हूँजो कहीं के नहीं रहते वो कहाँ जाते हैं
मैं जिन दिनों तिरे बारे में सोचता हूँ बहुतउन्हीं दिनों तो ये दुनिया समझ में आती है
तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैंसज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं
मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँवो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो
तर्क-ए-मय ही समझ इसे नासेहइतनी पी है कि पी नहीं जाती
ये समझ के माना है सच तुम्हारी बातों कोइतने ख़ूब-सूरत लब झूट कैसे बोलेंगे
जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लियाजो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया
तुम इसे शिकवा समझ कर किस लिए शरमा गएमुद्दतों के बा'द देखा था तो आँसू आ गए
चंद तस्वीर-ए-बुताँ चंद हसीनों के ख़ुतूतबा'द मरने के मिरे घर से ये सामाँ निकला
यूँ बरसती हैं तसव्वुर में पुरानी यादेंजैसे बरसात की रिम-झिम में समाँ होता है
मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया कोसमझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे
मिरे अज़ीज़ ही मुझ को समझ न पाए कभीमैं अपना हाल किसी अजनबी से क्या कहता
क़रीब आओ तो शायद समझ में आ जाएकि फ़ासले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
क्या जाने किस अदा से लिया तू ने मेरा नामदुनिया समझ रही है कि सच-मुच तिरा हूँ मैं
ग़म के भरोसे क्या कुछ छोड़ा क्या अब तुम से बयान करेंग़म भी रास आया दिल को और ही कुछ सामान करें
मोती समझ के शान-ए-करीमी ने चुन लिएक़तरे जो थे मिरे अरक़-ए-इंफ़िआ'ल के
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