aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "samog"
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजेइक आग का दरिया है और डूब के जाना है
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँरोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही हैतू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
मैं जिन दिनों तिरे बारे में सोचता हूँ बहुतउन्हीं दिनों तो ये दुनिया समझ में आती है
बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल थाबर्बादियों का जश्न मनाता चला गया
मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँवो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो
हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थीहमीं को शम्अ जलाने का हौसला न हुआ
तर्क-ए-मय ही समझ इसे नासेहइतनी पी है कि पी नहीं जाती
ये समझ के माना है सच तुम्हारी बातों कोइतने ख़ूब-सूरत लब झूट कैसे बोलेंगे
जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लियाजो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया
तुम इसे शिकवा समझ कर किस लिए शरमा गएमुद्दतों के बा'द देखा था तो आँसू आ गए
राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझेआदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद
जब से तू ने मुझे दीवाना बना रक्खा हैसंग हर शख़्स ने हाथों में उठा रक्खा है
मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया कोसमझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे
मिरे अज़ीज़ ही मुझ को समझ न पाए कभीमैं अपना हाल किसी अजनबी से क्या कहता
क़रीब आओ तो शायद समझ में आ जाएकि फ़ासले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
क्या जाने किस अदा से लिया तू ने मेरा नामदुनिया समझ रही है कि सच-मुच तिरा हूँ मैं
मोती समझ के शान-ए-करीमी ने चुन लिएक़तरे जो थे मिरे अरक़-ए-इंफ़िआ'ल के
बदन के कर्ब को वो भी समझ न पाएगामैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी
आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में'ग़ालिब' सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है
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