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शेर
जाने कितनी बार सिक्कों को गिना करते थे हम
नोट की गड्डी ने हम से रेज़गारी छीन ली
राघवेंद्र द्विवेदी
शेर
खिड़कियाँ खोल लूँ हर शाम यूँही सोचों की
फिर उसी राह से यादों को गुज़रता देखूँ