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शेर
बाल रुख़्सारों से जब उस ने हटाए तो खुला
दो फ़रंगी सैर को निकले हैं मुल्क-ए-शाम से
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
कटने लगीं रातें आँखों में देखा नहीं पलकों पर अक्सर
या शाम-ए-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है
इब्न-ए-इंशा
शेर
खुलता है क़ुफ़्ल-ए-ऐश मिरा इस से 'मुसहफ़ी'
जिस के इज़ार-बंद में छोटी कलीद है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
तलाश इस तरह बज़्म-ए-ऐश में है बे-निशानों की
कोई कपड़े में जैसे ज़ख़्म-ए-सोज़न का निशाँ ढूँढे
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
शेर
तंगी-ए-ऐश में मुमकिन नहीं तर्क-ए-लज़्ज़त
सूखे टुकड़े भी तो फ़ाक़ों में मज़ा देते हैं
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
शेर
तेरी फ़ुर्क़त में शराब-ए-ऐश का तोड़ा हुआ
जाम-ए-मय दस्त-ए-सुबू के वास्ते फोड़ा हुआ