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शेर
कब शब-ए-वस्ल वो आया कि मिरे और उस के
दरमियाँ में शब-ए-हिज्राँ का फ़साना न रहा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
घटती है शब-ए-वस्ल तो कहता हूँ मैं या-रब
क्या तुझ को बनानी थी यही रात ज़रा सी