aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "shab-e-vasl-e-do-aalam"
कहना किसी का सुब्ह-ए-शब-ए-वस्ल नाज़ सेहसरत तुम्हारी जान हमारी निकल गई
ले शब-ए-वस्ल-ए-ग़ैर भी काटीतू मुझे आज़माएगा कब तक
निस्यह-ओ-नक़्द-ए-दो-आलम की हक़ीक़त मालूमले लिया मुझ से मिरी हिम्मत-ए-आली ने मुझे
शब-ए-वस्ल घबरा के कहना किसी काबता दीजिए हम से क्या कीजिएगा
दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रातहाए कम-बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया
बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दोमुझ को दम भर के लिए ग़ैर की क़िस्मत दे दो
शब-ए-वस्ल की क्या कहूँ दास्ताँज़बाँ थक गई गुफ़्तुगू रह गई
शब-ए-वस्ल थी चाँदनी का समाँ थाबग़ल में सनम था ख़ुदा मेहरबाँ था
शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गईनहीं होते होते सहर हो गई
शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आयावो कुछ आप ही आप शर्मा रहे हैं
दी मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहरहाए कम्बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया
कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं कीहाँ यार के रुख़्सार पे रुख़्सार तो रक्खा
क्या जल्द गुज़रती हैं शब-ए-वस्ल की घड़ियाँइक हिज्र का दिन है कि गुज़रता ही नहीं है
कल शब-ए-वस्ल में क्या जल्द बजी थीं घड़ियाँआज क्या मर गए घड़ियाल बजाने वाले
लिपटा के शब-ए-वस्ल वो उस शोख़ का कहनाकुछ और हवस इस से ज़ियादा तो नहीं है
क़हर है ज़हर है अग़्यार को लाना शब-ए-वस्लऐसे आने से तो बेहतर है न आना शब-ए-वस्ल
हैराँ हूँ इस क़दर कि शब-ए-वस्ल भी मुझेतू सामने है और तिरा इंतिज़ार है
दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज़ादतिरे जुनूँ का ख़ुदा सिलसिला दराज़ करे
मेरी हवस को ऐश-ए-दो-आलम भी था क़ुबूलतेरा करम कि तू ने दिया दिल दुखा हुआ
किस नाज़ से कहते हैं वो झुँझला के शब-ए-वस्लतुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते
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