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शेर
शाहिद ग़ाज़ी
शेर
बनाते हैं हज़ारों ज़ख़्म-ए-ख़ंदाँ ख़ंजर-ए-ग़म से
दिल-ए-नाशाद को हम इस तरह पुर-शाद करते हैं
इम्दाद इमाम असर
शेर
ज़ेर-ए-ख़ंजर मैं तड़पता हूँ फ़क़त इस वास्ते
ख़ून मेरा उड़ के दामन-गीर हो जल्लाद का
जलील मानिकपूरी
शेर
हूँ तिश्ना-काम-ए-दश्त-ए-शहादत ज़ि-बस कि मैं
गिरता हूँ आब-ए-ख़ंजर-ओ-शमशीर देख कर
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
शेर
हर्फ़-ए-इंकार है क्यूँ नार-ए-जहन्नम का हलीफ़
सिर्फ़ इक़रार पे क्यूँ बाब-ए-इरम खुलता है
वहीद अख़्तर
शेर
उस शाहिद-ए-निहाँ का कुश्ता हूँ मैं कि जिस ने
खींची है दरमियाँ में दीवार ज़िंदगी से
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
तह-ए-आरिज़ जो फ़रोज़ाँ हैं हज़ारों शमएँ
लुत्फ़-ए-इक़रार है या शोख़ी-ए-इंकार का रंग