aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "sheva-e-bedaad"
मैं चुप रहा कि वज़ाहत से बात बढ़ जातीहज़ार शेवा-ए-हुस्न-ए-बयाँ के होते हुए
हर बुल-हवस ने हुस्न-परस्ती शिआ'र कीअब आबरू-ए-शेवा-ए-अहल-ए-नज़र गई
सख़्त मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीमहम भी आख़िर को जी चुराने लगे
उन से किस मुँह से शिकवा-ए-बेदादज़िंदगी ख़ुद है इक जफ़ा तौबा
तू मुझे ज़हर पिलाती है ये तेरा शेवाऐ मिरी रात तुझे ख़ून पिलाया मैं ने
क्यूँ न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बे-दाद कि हमआप उठा लेते हैं गर तीर ख़ता होता है
तिलिस्म-ए-शेवा-ए-याराँ खुला तो कुछ न हुआकभी ये हब्स-ए-दिल-ओ-जाँ खुले तो बात चले
शेवा-ए-अफ़्सुर्दगी को कम न बूझख़ाक का कहते हैं आलम पाक है
पा रहा है दिल मुसीबत के मज़ेआए लब पर शिकवा-ए-बेदाद क्या
शेर मेरे भी हैं पुर-दर्द व-लेकिन 'हसरत''मीर' का शेवा-ए-गुफ़्तार कहाँ से लाऊँ
माइल-ए-बेदाद वो कब था 'फ़िराक़'तू ने उस को ग़ौर से देखा नहीं
'बेदार' राह-ए-इश्क़ किसी से न तय हुईसहरा में क़ैस कोह में फ़रहाद रह गया
शराब ओ साक़ी-ए-मह-रू जो साथ हों 'बेदार'तो ख़ुश-नुमा है शब-ए-माहताब में दरिया
वस्ल की रात ख़ुशी ने मुझे सोने न दियामैं भी बेदार रहा ताले-ए-बेदार के साथ
कोई ख़बर ही न थी मर्ग-ए-जुस्तुजू की मुझेज़मीं फलाँग गया अपने शौक़-ए-बेहद में
हिज्र इक वक़्फ़ा-ए-बेदार है दो नींदों मेंवस्ल इक ख़्वाब है जिस की कोई ताबीर नहीं
तुझ से मिलने पर बुत-ए-बेदर्द ये उक़्दा खुलाभोली-भाली शक्ल वाले होते हैं जल्लाद भी
हर शख़्स यहाँ गुम्बद-ए-बे-दर की तरह हैआवाज़ पे आवाज़ दो सुनता नहीं कोई
यार को मैं ने मुझे यार ने सोने न दियारात भर ताला'-ए-बेदार ने सोने न दिया
कहेगी हश्र के दिन उस की रहमत-ए-बे-हदकि बे-गुनाह से अच्छा गुनाह-गार रहा
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