aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "taa"
काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ देंफूलों का क्या जो साँस की गर्मी न सह सकें
अमीर-ज़ादों से दिल्ली के मिल न ता-मक़्दूरकि हम फ़क़ीर हुए हैं इन्हीं की दौलत से
वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम तो नहीं बन सकतादर्द कुछ होते हैं ता-उम्र रुलाने वाले
बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैंसहर की राह तकना ता सहर आसाँ नहीं होता
ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भरआने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में
एक रिश्ता जिसे मैं दे न सका कोई नामएक रिश्ता जिसे ता-उम्र निभाए रक्खा
अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइएता-ज़िंदगी ये दिल न कोई आरज़ू करे
है ता-हद्द-ए-इम्काँ कोई बस्ती न बयाबाँआँखों में कोई ख़्वाब दिखाई नहीं देता
अज़ल से ता-ब-अबद एक ही कहानी हैइसी से हम को नई दास्ताँ बनानी है
ता-क़यामत ज़िक्र से रौशन रहेगी ये ज़मींज़ुल्मतों की शाम में इक रौशनी है कर्बला
सुल्ह जिस से रही मेरी ता-ज़िंदगीउस का सारे ज़माने से झगड़ा सा था
आप जिस रह-गुज़र-ए-दिल से कभी गुज़रे थेउस पे ता-उम्र किसी को भी गुज़रने न दिया
मैं 'ज़फ़र' ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस मेंअपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए
तिरा शबाब रहे हम रहें शराब रहेये दौर ऐश का ता दौर-ए-आफ़्ताब रहे
तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ोता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है
अपना ही हाल तक न खुला मुझ को ता-ब-मर्गमैं कौन हूँ कहाँ से चला था कहाँ गया
आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि तातुझ पे खुल जावे कि इस को हसरत-ए-दीदार है
तू सरापा अज्र ऐ ज़ाहिद मैं सर-ता-पा गुनाहबाग़-ए-जन्नत तेरी ख़ातिर कर्बला मेरे लिए
कौन सी ऐसी ख़ुशी है जो मिली हो एक बारऔर ता-उम्र हमें जिस ने अज़िय्यत नहीं दी
दे गया ख़ूब सज़ा मुझ को कोई कर के मुआफ़सर झुका ऐसे कि ता-उम्र उठाया न गया
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