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शेर
तालिब-ए-बोसा हूँ मैं क़ासिद वो हैं ख़्वाहान-ए-जान
ये ज़रा सी बात है मिलते ही तय हो जाएगी
हबीब मूसवी
शेर
रखे है लज़्ज़त-ए-बोसा से मुझ को गर महरूम
तो अपने तू भी न होंटों तलक ज़बाँ पहुँचा
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
ब-वक़्त-ए-बोसा-ए-लब काश ये दिल कामराँ होता
ज़बाँ उस बद-ज़बाँ की मुँह में और मैं ज़बाँ होता
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
शेर
एक पत्थर पूजने को शैख़ जी काबे गए
'ज़ौक़' हर बुत क़ाबिल-ए-बोसा है इस बुत-ख़ाने में
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
हाए 'तालिब' देखने को उस की सूरत के लिए
मुर्ग़-ए-दिल तड़पे है कैसा उड़ के मिलना चाहिए