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शेर
क्या उस से बिछड़ते कि मिले ही न थे जिस से
इक-तरफ़ा मोहब्बत के भी हैं ज़ाविए क्या क्या
रियासत अली असरार
शेर
अपने मरकज़ की तरफ़ माइल-ए-परवाज़ था हुस्न
भूलता ही नहीं आलम तिरी अंगड़ाई का