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शेर
मिरी क़िस्मत लिखी जाती थी जिस दिन मैं अगर होता
उड़ा ही लेता दस्त-ए-कातिब-ए-तक़दीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
उसी दिन से मुझे दोनों की बर्बादी का ख़तरा था
मुकम्मल हो चुके थे जिस घड़ी अर्ज़-ओ-समा बन कर
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
हम इस लम्बे-चौड़े घर में शब को तन्हा होते हैं
देख किसी दिन आ मिल हम से हम को तुझ से काम है चाँद
इब्न-ए-इंशा
शेर
गर यही ना-साज़ी-ए-दीं है तो इक दिन शैख़-जी
फिर वही हम हैं वही बुत है वही ज़ुन्नार है
क़ाएम चाँदपुरी
शेर
है शैख़-ओ-बरहमन के दीन की हद दैर-ओ-का'बा तक
सवाद-ए-दीन-ए-इश्क़-ए-बे-ग़रज़ कौन-ओ-मकाँ तक है
दत्तात्रिया कैफ़ी
शेर
मैं कुफ़्र ओ दीं से गुज़र कर हुआ हूँ ला-मज़हब
ख़ुदा-परस्त से मतलब न बुत-परस्त से काम
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
शेर
ले गया दे एक बोसा अक़्ल ओ दीन ओ दिल वो शोख़
क्या हिसाब अब कीजे कुछ अपना ही फ़ाज़िल रह गया
शाह नसीर
शेर
सर-रिश्ता कुफ़्र-ओ-दीं का हक़ीक़त में एक है
जो तार-ए-सुब्हा है सो है ज़ुन्नार देखना
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
शेर
यही तो कुफ़्र है यारान-ए-बे-ख़ुदी के हुज़ूर
जो कुफ़्र-ओ-दीं का मिरे यार इम्तियाज़ रहा