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शेर
कई बारी बिना हो जिस की फिर कहते हैं टूटेगा
ये हुर्मत जिस की हो ऐ शैख़ क्या तेरा वो मक्का है
ताबाँ अब्दुल हई
शेर
नहीं है जिस में तेरा इश्क़ वो दिल है तबाही में
वो कश्ती डूब जाएगी न जिस में ना-ख़ुदा होगा
रशीद लखनवी
शेर
एक भी ख़्वाब न हो जिन में वो आँखें क्या हैं
इक न इक ख़्वाब तो आँखों में बसाओ यारो
जाँ निसार अख़्तर
शेर
क्या है वो जान-ए-मुजस्सम जिस के शौक़-ए-दीद में
जामा-ए-तन फेंक कर रूहें भी उर्यां हो गईं
इस्माइल मेरठी
शेर
मोहब्बत वो है जिस में कुछ किसी से हो नहीं सकता
जो हो सकता है वो भी आदमी से हो नहीं सकता
क़लक़ मेरठी
शेर
शाद आरफ़ी
शेर
ये वो मौसम है जिस में कोई पत्ता भी नहीं हिलता
दिल-ए-तन्हा उठाता है सऊबत शाम-ए-हिज्राँ की
अहमद मुश्ताक़
शेर
बरहना देख कर आशिक़ में जान-ए-ताज़ा आती है
सरापा रूह का आलम है तेरे जिस्म-ए-उर्यां में
रिन्द लखनवी
शेर
वो क्या कि जिस को मयस्सर है मुस्तक़िल होना
सरिश्त-ए-ज़ख़्म में शामिल है मुंदमिल होना
आसिम नदीम आसी
शेर
ख़याल-ए-ज़ुल्फ़ अगर है तो दिल की ख़ैर नहीं
वो टूट जाता है शीशा कि जिस में बाल हुआ