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शेर
मैं अपने रू-ब-रू हूँ और कुछ हैरत-ज़दा हूँ मैं
न जाने अक्स हूँ चेहरा हूँ या फिर आइना हूँ मैं
ख़ुशबीर सिंह शाद
शेर
इन्ही हैरत-ज़दा आँखों से देखे हैं वो आँसू भी
जो अक्सर धूप में मेहनत की पेशानी से ढलते हैं
जमील मज़हरी
शेर
ज़िंदगी मौत बन गई होती जान से हम गुज़र गए होते
इतने इशरत-ज़दा हैं हम कि अगर ग़म न होता तो मर गए होते
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
शेर
अब अंधेरों में जो हम ख़ौफ़-ज़दा बैठे हैं
क्या कहें ख़ुद ही चराग़ों को बुझा बैठे हैं
ख़ुशबीर सिंह शाद
शेर
शब भर इक आवाज़ बनाई सुब्ह हुई तो चीख़ पड़े
रोज़ का इक मामूल है अब तो ख़्वाब-ज़दा हम लोगों का