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शेर
बाल रुख़्सारों से जब उस ने हटाए तो खुला
दो फ़रंगी सैर को निकले हैं मुल्क-ए-शाम से
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
ब-ज़ेर-ए-क़स्र-ए-गर्दूं क्या कोई आराम से सोए
ये छत ऐसी पुरानी है कि शबनम से टपकती है
इमाम बख़्श नासिख़
शेर
यहाँ हर आने वाला बन के इबरत का निशाँ आया
गया ज़ेर-ए-ज़मीं जो कोई ज़ेर-ए-आसमाँ आया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शेर
जुनूँ में और ख़िरद में दर-हक़ीक़त फ़र्क़ इतना है
वो ज़ेर-ए-दर है साक़ी और ये ज़ेर-ए-दाम है साक़ी
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
शेर
मेरे नाले के न क्यूँ हो चर्ख़-ए-अख़्ज़र ज़ेर-ए-पा
ख़ुत्बा ख़्वान-ए-इश्क़ है रखता है मिम्बर ज़ेर-ए-पा
शाह नसीर
शेर
है कारवान-ए-क़ुदसी-ए-हर्फ़-ए-अज़ल रवाँ
हर जेहल-ओ-ज़ुल्म-ओ-ज़ुल्मत-ओ-ज़ेर-ओ-ज़बर के साथ
अख़लाक़ अहमद आहन
शेर
ये बात मुंसिफ़ों में अभी ज़ेर-ए-ग़ौर है
पत्थर को मैं लगा हूँ कि पत्थर लगा मुझे