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शेर
मेरे नाले के न क्यूँ हो चर्ख़-ए-अख़्ज़र ज़ेर-ए-पा
ख़ुत्बा ख़्वान-ए-इश्क़ है रखता है मिम्बर ज़ेर-ए-पा
शाह नसीर
शेर
यहाँ हर आने वाला बन के इबरत का निशाँ आया
गया ज़ेर-ए-ज़मीं जो कोई ज़ेर-ए-आसमाँ आया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शेर
जुनूँ में और ख़िरद में दर-हक़ीक़त फ़र्क़ इतना है
वो ज़ेर-ए-दर है साक़ी और ये ज़ेर-ए-दाम है साक़ी
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
शेर
हुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वाले
तमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकले
अल्लामा इक़बाल
शेर
है कारवान-ए-क़ुदसी-ए-हर्फ़-ए-अज़ल रवाँ
हर जेहल-ओ-ज़ुल्म-ओ-ज़ुल्मत-ओ-ज़ेर-ओ-ज़बर के साथ
अख़लाक़ अहमद आहन
शेर
पेड़ ऊँचा है मगर ज़ेर-ए-ज़मीं कितना है
लब पे है नाम-ए-ख़ुदा दिल में यक़ीं कितना है
सुहैल अहमद ज़ैदी
शेर
सख़्त है हैरत हमें जो ज़ेर-ए-अबरू ख़ाल है
हम तो सुनते थे कि का'बे में कोई हिन्दू नहीं