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शेर
हादसात-ए-दहर में वाबस्ता-ए-अर्बाब-ए-दर्द
ली जहाँ करवट किसी ने इंक़लाब आ ही गया
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
'नज़र' ने उन को जब देखा तो डैडी साथ थे उन के
हमारे दरमियाँ हर वक़्त वो पीर-ए-मुग़ाँ क्यूँ हो?
नज़र बर्नी
शेर
करते हैं अर्बाब-ए-दिल अंदाज़ा-ए-जोश-ए-बहार
मेरा दामन देख कर मेरा गरेबाँ देख कर