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शेर
इस ज़माने में ख़मोशी से निकलता नहीं काम
नाला पुर-शोर हो और ज़ोरों पे फ़रियाद रहे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शेर
साक़िया अब के बड़े ज़ोरों पे हैं हम मय-परस्त
चल के वाइ'ज़ को सर-ए-मिंबर लताड़ा चाहिए
वज़ीर अली सबा लखनवी
शेर
तरब-ज़ारों पे क्या गुज़री सनम-ख़ानों पे क्या गुज़री
दिल-ए-ज़िंदा मिरे मरहूम अरमानों पे क्या गुज़री
साहिर लुधियानवी
शेर
एक दिन वो ज़र्रों को आफ़्ताब कर लेंगे
धूप के जो ख़्वाहाँ हैं रात के अँधेरे में
महफूजुर्रहमान आदिल
शेर
चमक शायद अभी गीती के ज़र्रों की नहीं देखी
सितारे मुस्कुराते क्यूँ हैं ज़ेब-ए-आसमाँ हो कर
सिराज लखनवी
शेर
ख़ुदा जाने ज़माना आज किस हालत में रहता है
कि वीरानों से बढ़ कर है चमन-ज़ारों की रुस्वाई
अज़मत अब्दुल क़य्यूम ख़ाँ
शेर
ख़ाक के ज़र्रों से उफ़ उफ़ की सदा आती है
मेरा अफ़्साना-ए-ग़म क़िस्सा-ए-माज़ी न हुआ