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शेर
फ़िक्र है शौक़-ए-कमर इश्क़-ए-दहाँ पैदा करूँ
चाहता हूँ एक दिल में दो मकाँ पैदा करूँ
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
पर्दा-ए-लुत्फ़ में ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या कहिए
हाए ज़ालिम तिरा अंदाज़-ए-करम क्या कहिए
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
तुम्हारी ज़ुल्फ़ न गिर्दाब-ए-नाफ़ तक पहुँची
हुई न चश्मा-ए-हैवाँ से फ़ैज़-याब घटा
वज़ीर अली सबा लखनवी
शेर
या हुस्न हुआ मजबूर-ए-करम या इश्क़ ने मंज़िल पाली है
वो ज़ुल्फ़ बिखेरे आए हैं इक वहशी के समझाने को
शौकत रिज़वी
शेर
हम से पाई नहीं जाती कमर उस की ऐ ज़ुल्फ़
तू ही कुछ राह बता दे तो कमर पैदा हो