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ग़ज़ल
हैं मोहब्बतों की अमानतें यही हिजरतें यही क़ुर्बतें
दिए बाम-ओ-दर किसी और ने तो रहा बसा कोई और है
नसीर तुराबी
ग़ज़ल
दरीचों को तो देखो चिलमनों के राज़ तो समझो
उठेंगे पर्दा-हा-ए-बाम-ओ-दर आहिस्ता आहिस्ता
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
सम्तों में बिखरी वो ख़ल्वत वो दिल की रंग-ए-आबादी
या'नी वो जो बाम-ओ-दर थे यकसर गर्द-ओ-बाद हुए
जौन एलिया
ग़ज़ल
कभी मौसमों के सराब में कभी बाम-ओ-दर के अज़ाब में
वहाँ उम्र हम ने गुज़ार दी जहाँ साँस लेना मुहाल था
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी
सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी