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ग़ज़ल
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
ग़ज़ल
दमा-दम शो'बदे हम को दिखाता है कोई जल्वा
कहीं शैख़-ए-हरम हो कर कहीं पीर-ए-मुग़ाँ हो कर
हरी चंद अख़्तर
ग़ज़ल
दमा की वो मरीज़ा है मुझे खाँसी ने घेरा है
बुढ़ापे में बड़ी मजबूरियाँ दोनों तरफ़ से हैं