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ग़ज़ल
अगर आए नहीं ऐ फ़ारहा अब भी तुम्हारे ख़त
तो मैं ने 'जौन' सा हुलिया बना लेना है रो रो के
अशरफ़ जहाँगीर
ग़ज़ल
किसी के ज़ख़्म पर अश्कों का फाहा रख दिया जाए
चलो सूरज के सर पर थोड़ा साया रख दिया जाए
रज़ा मौरान्वी
ग़ज़ल
इलाज-ए-दर्द-ए-दिल मेरा करे वो चारागर कैसे
जो दिल गुर्दे को समझे और जिगर को फेफड़ा समझे
बुलबुल काश्मीरी
ग़ज़ल
ग़ैब से सहरा-नवरदों का मुदावा हो गया
दामन-ए-दश्त-ए-जुनूँ ज़ख़्मों का फाहा हो गया
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
ये अपने हाल ही में मस्त हैं इन को किसी से क्या
ख़बर दुनिया वमा-फ़ीहा की मय-ख़्वारों से मत पूछो
मीर हसन
ग़ज़ल
फफक कर रो रहे यूँ ये तुम क्यों मर नहीं जाते
नहीं मैं मर नहीं सकता नहीं हूँ कोहकन आख़िर
अदनान हामिद
ग़ज़ल
नहीं है लज़्ज़त-ए-दुनिया ओ मा-फ़ीहा जो क़िस्मत में
ख़ुदा-मा'लूम हिस्सा है मिरा किस ख़्वान-ए-ने'मत में
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
पुर्सिश है चश्म-ए-अश्क-फ़शाँ पर न आए हर्फ़
डूबें भी हम तो सैल-ए-रवाँ पर न आए हर्फ़
अब्दुल मन्नान तरज़ी
ग़ज़ल
मिरे ज़ख़्मों पे जो अश्कों का फाहा रख दिया तुम ने
मिरी जाँ हम भी इस को प्यार का मरहम समझते हैं
अख़्तर राँचवीं
ग़ज़ल
जो मेहर-ए-हश्र मिरे दाग़-ए-दिल का फाहा हो
रवा है अब्र का रूमाल चश्म-ए-तर के लिए