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ग़ज़ल
गुल होर गुलाब मियाने नईं कुच फ़र्क़ अज़ल से
यू पिव सूँ मिल रही हूँ उल्फ़त इसे कुत्ते हैं
अली आदिल शाह दुतीय
ग़ज़ल
उनो यहाँ आओ कहेंगे तो कहूँगी काम करती हूँ
अठलती होर मठलती चुप घड़ी दो-चार बैठूँगी
हाश्मी बीजापुरी
ग़ज़ल
बुत-ख़ाने नयन तेरे होर बुत नयन कियाँ पुतलियाँ
मुज नयन में पुजारी पूजा अधान हमारा
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
बंदा है अपनी तफ़सीलात सूँ ज़ात-ए-ख़ुदा मुतलक़
सिफ़त होर फ़े'अल-ओ-क़ौल उस का बी मुतलक़-पन को शामिल है
क़ुर्बी वेलोरी
ग़ज़ल
अज़ल थे साईं का दिल होर मेरा दिल के हैं एक
बिछड़ कर क्यूँ रहूँ ऐसे जीवन प्यारे थे यक तिल में
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
कम-निगाही होर तग़ाफ़ुल मत कर ऐ माह-ए-तमाम
मुक तिरा करता है ग़म्ज़ा काम 'आशिक़ का तमाम
क़ुर्बी वेलोरी
ग़ज़ल
मोती सूँ होर सुने से न जानों दिया है कुन
भर सब अपस के तन कूँ मुड़ी थी नज़र पड़ी
क़ाज़ी महमूद बेहरी
ग़ज़ल
ऐ सखीयन मैं ने देख्या संग कर के यार का
पन न देख्या बे-समझ होर संग-दिल तुझ सार का