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ग़ज़ल
इश्क़ है अपना पाएदार तेरी वफ़ा है उस्तुवार
हम तो हलाक-ए-वर्ज़िश-ए-फ़र्ज़-ए-मुहाल हो गए
जौन एलिया
ग़ज़ल
कासा-ए-शाम में सूरज का सर और आवाज़-ए-अज़ाँ
और आवाज़-ए-अज़ाँ कहती है फ़र्ज़ निभाना है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
ताबिश कानपुरी
ग़ज़ल
एक के घर की ख़िदमत की और एक के दिल से मोहब्बत की
दोनों फ़र्ज़ निभा कर उस ने सारी उम्र इबादत की
ज़ेहरा निगाह
ग़ज़ल
क्या अब भी मुझ पे फ़र्ज़ नहीं दोस्ती-ए-कुफ़्र
वो ज़िद से मेरी दुश्मन-ए-इस्लाम हो गया
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
मियाँ से बीबी हैं पर्दा है उन को फ़र्ज़ मगर
मियाँ का इल्म ही उट्ठा तो फिर मियाँ कब तक