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ग़ज़ल
है वही बद-मस्ती-ए-हर-ज़र्रा का ख़ुद 'उज़्र-ख़्वाह
जिस के जल्वे से ज़मीं ता आसमाँ सरशार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
अब्दुल समद आसी
ग़ज़ल
ये करम है दोस्तों का जो वो कह रहे हैं सब से
कि 'नसीर' पर 'इनायत कभी थी न है न होगी
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
लुत्फ़ जो उन के इशारात-ओ-किनायात में है
वो किसी हर्फ़-ओ-हिकायत न किसी बात में है