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ग़ज़ल
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती
जब भी उस के पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
किताबें चीख़ने लगती हैं जब वो पास से गुज़रे
इन्हें वो चूम के रखती है सीने से लगाती है
अज़ीम कामिल
ग़ज़ल
बीन हवा के हाथों में है लहरे जादू वाले हैं
चंदन से चिकने शानों पर मचल उठे दो काले हैं
अमीक़ हनफ़ी
ग़ज़ल
तर्क-ए-मोहब्बत तर्क-ए-तमन्ना कर चुकने के बाद
हम पे ये मुश्किल आन पड़ी है कैसे भुलाएँ तुम्हें
ज़ुहूर नज़र
ग़ज़ल
ख़ुद की ख़ातिर न ज़माने के लिए ज़िंदा हूँ
क़र्ज़ मिट्टी का चुकाने के लिए ज़िंदा हूँ
क़मर इक़बाल
ग़ज़ल
दिन रात हम को क़र्ज़ चुकाने की फ़िक्र है
गो उस ने वापसी का तक़ाज़ा नहीं किया