aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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वो गाँव का इक ज़ईफ़ दहक़ाँ सड़क के बनने पे क्यूँ ख़फ़ा थाजब उन के बच्चे जो शहर जाकर कभी न लौटे तो लोग समझे
ज़'ईफ़ बरगद के हाथ में रा'शा आ गया हैजटाएँ आँखों पे गिर रही हैं उठाए कोई
ग़ालिब कि देवे क़ुव्वत-ए-दिल इस ज़ईफ़ कोतिनके को जो दिखावे है पल में पहाड़ कर
क़वी भी है ज़ईफ़ भी हमारा हाफ़िज़ा 'शुऊर'मज़े तमाम याद हैं अज़ाब एक भी नहीं
ज़'ईफ़ बूढ़ी जो पुल पर उदास बैठी हैउसी की आँख में लिक्खा है ज़िंदगी हूँ मैं
शिकस्ता बाल हूँ वो मुर्ग़-ए-नातवाँ-ओ-ज़ईफ़कि मैं तो मैं न उड़े मेरे आशियाँ की तरह
इब्तिदा से हम ज़ईफ़ ओ ना-तवाँ पैदा हुएउड़ गया जब रंग रुख़ से उस्तुख़्वाँ पैदा हुए
अब मुझ ज़ईफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करोजाती नहीं है मुझ से किसू की उठाई बात
'असद' ब-नाज़ुकी-ए-तब'-ए-आरज़ू इंसाफ़कि एक वह्म-ए-ज़'ईफ़-ओ-ग़म-ए-दो-'आलम है
ज़ईफ़ बाप की ख़िदमत की बात जब आईतो मौसमों की तरह से पिसर बदलते रहे
'दर्द' हर-चंद मैं ज़ाहिर में तो हूँ मोर-ए-ज़ईफ़ज़ोर निस्बत है वले मुझ को 'सुलैमान' के साथ
बैठा हूँ जूँ ग़ुबार-ए-ज़ईफ़ अब वगर्ना मेंफिरता रहा हूँ गलियों में आवारा-गर्द सा
ऐ बाग़-ए-दिल के मिलनसार बाग़बान-ए-ज़ईफ़दरख़्त देने लगे हैं समर कहाँ हो तुम
साथ ज़ईफ़ बाप के लग गईं काम-काज परगहने छुपा के लड़कियाँ दादी के पान-दान में
ज़ईफ़ बाप का साया भी कम नहीं 'एजाज़'महाज़-ए-ज़ीस्त में ये नाम एक ढाल तो है
जो उस की और को जाना मिले तो हम भी ज़'ईफ़हज़ार सज्दे हर इक गाम सरबराह करें
बंदा-नवाज़ियाँ तो ये देखो कि आदमीजुज़्व-ए-ज़ईफ़ महरम-ए-असरार-ए-कुल हुआ
ज़’ईफ़ हो गए 'अकबर' मगर नशा न गयाजवाब ही नहीं साक़ी वो बादा-ख़्वारी की
ज़ईफ़ उँगली को थाम कर मैंबड़ी सहूलत से चल रहा था
मैं साँस लेते ज़'ईफ़ जिस्मों में रह चुका हूँमैं हादिसा हूँ उदास लोगों में रह चुका हूँ
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