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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
न सुहाग-रात चमक सकी यूँही कसमसाते सहर हुई
कोई दीप गुम-शुदा थालियों में जलाना हो कहीं यूँ न हो
साबिर ज़फ़र
ग़ज़ल
मैं अपने प्यार का दीप लिए आफ़ाक़ में हर-सू घूम गया
तुम दूर कहीं जा पहुँचे थे आकाश पे जी बहलाने को
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ की चमक पैकर-ए-सीमीं की दमक
दीप-माला है सर-ए-गंग-ओ-जमन क्या कहना