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ग़ज़ल
वो सब मीज़ाइल ये सारे एटम बस इक क्रोना की मार निकले
अब ऐसे आलम में देख लें सब कि चीन कैसे डटा हुआ है
असलम गुरदासपुरी
ग़ज़ल
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
बिना मंज़िल के रस्तों का सफ़र अपना रहा है
मिरे दिल में वो यक-तरफ़ा मोहब्बत ला रहा है
उमूद अबरार अहमद
ग़ज़ल
चाँद सी आँखें खेल रही थीं सुर्ख़ पहाड़ की ओटों से
पूरब ओर से ताक रहा था उठ कर अब्र का पारा भी