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ग़ज़ल
ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
हामी भी न थे मुंकिर-ए-'ग़ालिब' भी नहीं थे
हम अहल-ए-तज़बज़ुब किसी जानिब भी नहीं थे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
बंद दरीचे सूनी गलियाँ अन-देखे अनजाने लोग
किस नगरी में आ निकले हैं 'साजिद' हम दीवाने लोग
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
मियाँ से बीबी हैं पर्दा है उन को फ़र्ज़ मगर
मियाँ का 'इल्म ही उट्ठा तो फिर मियाँ कब तक
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
हर एक की हर पसंद ठहरे हर एक का इंतिख़ाब निकले
हमी को अच्छा बताया सब ने हमी ज़ियादा ख़राब निकले
अक़ील नोमानी
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
थोड़ी सी शोहरत भी मिली है थोड़ी सी बदनामी भी
मेरी सीरत में ऐ 'क़ैसर' ख़ूबी भी है ख़ामी भी
क़ैसर शमीम
ग़ज़ल
ज़ाहिरन ये बुत तो हैं नाज़ुक गुल-ए-तर की तरह
दिल मगर होता है कम-बख़्तों का पत्थर की तरह
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
दिल में रहता है कोई दिल ही की ख़ातिर ख़ामोश
जैसे तस्वीर में बैठा हो मुसव्विर ख़ामोश