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ग़ज़ल
जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया
सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
नज़र जब से किसी की मेहरबाँ मा'लूम होती है
ये दुनिया गुल्सिताँ-दर-गुल्सिताँ मा'लूम होती है
नाज़नीन बेगम नाज़
ग़ज़ल
ग़म-ए-दिल को बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ कहना ही पड़ता है
मोहब्बत को हयात-ए-जावेदाँ कहना ही पड़ता है
सईद शहीदी
ग़ज़ल
ग़म-ए-दिल को बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ कहना ही पड़ता है
मोहब्बत को हयात-ए-जाविदाँ कहना ही पड़ता है
सईद शहीदी
ग़ज़ल
ये इश्क़ कल तुझे हुस्न-ए-जवाँ मिले न मिले
न देर कर कि ये जिंस-ए-गिराँ मिले न मिले
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
दिल अगर शाइस्ता-ए-दर्द-ए-निहाँ पैदा करें
हर ग़म-ए-जाँ-काह से आराम-ए-जाँ पैदा करें
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
एहतिराम-ए-गर्दिश-ए-अय्याम करना ही पड़ा
ग़म ग़लत करने को शग़्ल-ए-जाम करना ही पड़ा
अख़्तर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मेरी रिफ़अत पर जो हैराँ है तो हैरानी नहीं
तू अभी इंसान की अज़्मत का इरफ़ानी नहीं