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ग़ज़ल
ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँख में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे-चराग़ ये घर न हो
बशीर बद्र
ग़ज़ल
मैं असीर अपने ग़ज़ाल का मैं फ़क़ीर दश्त-ए-विसाल का
जो हिरन को बाँध के ले गया वो सुबुकतगीं कोई और है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
ये जमुना की हसीं अमवाज क्यूँ अर्गन बजाती हैं
मुझे गाना नहीं आता मुझे गाना नहीं आता
अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
किसी चश्म-ए-सियह का जब हुआ साबित मैं दीवाना
तो मुझ से सुस्त हाथी की तरह जंगली हिरन बिगड़ा
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
'इश्क़ के तग़ाफ़ुल से हर्ज़ा-गर्द है 'आलम
रू-ए-शश-जिहत-आफ़ाक़ पुश्त-ए-चश्म-ए-ज़िन्दाँ है