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ग़ज़ल
काम हुए हैं सारे ज़ाएअ' हर साअ'त की समाजत से
इस्तिग़्ना की चौगुनी उन ने जूँ जूँ मैं इबराम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ख़ुदा के पाक बंदों को हुकूमत में ग़ुलामी में
ज़िरह कोई अगर महफ़ूज़ रखती है तो इस्तिग़्ना
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
गदाई में भी मुझ पर शान-ए-इस्तिग़ना बरसती है
मिरे सर से हवा-ए-ताज-ए-सुल्तानी नहीं जाती
मख़मूर देहलवी
ग़ज़ल
तुम्ही हो जिस से मिली मुझ को शान-ए-इस्तिग़ना
कि मेरा ग़म भी तुम्ही ग़म के राज़-दाँ भी तुम्ही
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
ग़ुरूर-ए-हुस्न तेरी बे-नियाज़ी शान-ए-इस्तिग़ना
जभी तक है कि जब तक इश्क़ बे-पायाँ नहीं होता
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
इज्तिबा रिज़वी
ग़ज़ल
हालत इस्तिग़्ना की जिस के हाथ आई है यहाँ
उस के नज़दीक अंदक ओ बिसयार दोनों एक हैं
जोशिश अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
क़नाअत की भी दौलत हो तो इस्तिग़्ना नहीं लाज़िम
जिसे तू नफ़अ' समझा है यही नुक़सान कर देगा
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
अबस है नाज़-ए-इस्तिग़्ना पे कल की क्या ख़बर क्या हो
ख़ुदा मालूम ये सामान क्या हो जाए सर क्या हो
नज़्म तबातबाई
ग़ज़ल
मिरे जोश-ए-तलब की शान-ए-इस्तिग़ना कोई देखे
कि मैं रहबर से आगे मुझ से आगे है क़दम मेरा
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
बद-नुमा समझा गया पैवंद-ए-इस्तिग़्ना-ओ-हिर्स
नंग दल्क़-ए-फ़क़्र-ए-कश्कोल-ए-गदायाना हुआ
हबीब मूसवी
ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
कहीं रुस्वा न हो अब शान-ए-इस्तिग़ना मोहब्बत की
मिरी हालत तुम्हारे रहम के क़ाबिल न बन जाए