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ग़ज़ल
हर साल की आख़िरी शामों में दो चार वरक़ उड़ जाते हैं
अब और न बिखरे रिश्तों की बोसीदा किताब तो अच्छा हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
ये कैसे लोग हैं सदियों की वीरानी में रहते हैं
इन्हें कमरों की बोसीदा छतों से डर नहीं लगता
सलीम अहमद
ग़ज़ल
पुरानी सीढ़ियों पर मैं नए क़दमों को क्यूँ रखूँ
गिराऊँ किस लिए छत सर पे बोसीदा इमारत की
इक़बाल साजिद
ग़ज़ल
बोसीदा छाल पेड़ से लिपटी है गर तो क्या
अच्छे दिनों की आस पे ज़िंदा तो मैं भी हूँ