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ग़ज़ल
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
तू ने कितना फ़र्क़ ऐ बेताबी-ए-दिल कर दिया
साँस लेना भी वुफ़ूर-ए-ग़म से मुश्किल कर दिया
साक़िब कानपुरी
ग़ज़ल
फ़ज़ा-ए-क़ुर्ब में बेताबी-ए-दिल बढ़ती जाती है
मोहब्बत की तड़प मंज़िल-ब-मंज़िल बढ़ती जाती है
आरिफ़ नदवी
ग़ज़ल
किसी दिन देख लो आलम मिरी बेताबी-ए-दिल का
तमाशा देखना मंज़ूर है गर रक़्स-ए-बिस्मिल का